Gurukul Vidya Series • गुरुकुल विद्या

धर्म शास्त्र

सनातन जीवन-विधान

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥

"धर्म नष्ट करने पर स्वयं को नष्ट कर देता है, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश मत करो।" — मनुस्मृति

मनुस्मृति याज्ञवल्क्यस्मृति चार पुरुषार्थ चार आश्रम चार वर्ण षोडश संस्कार पञ्च यज्ञ
धर्म को जानें
नीचे
4पुरुषार्थ
4वर्ण
4आश्रम
16संस्कार
5पञ्च यज्ञ
18+प्रमुख स्मृतियाँ

धर्म शास्त्र क्या है?

धर्म — संस्कृत की "धृ" धातु से जन्मा शब्द जिसका अर्थ है "धारण करना"। धर्म वह है जो व्यक्ति, समाज और ब्रह्माण्ड को धारण करता है — जो इसे बाँधे रखता है, संचालित करता है और उन्नत करता है।

धर्म शास्त्र वह विद्या है जो मानव जीवन के उचित आचरण, सामाजिक व्यवस्था और आत्मिक उत्थान के नियम निर्धारित करती है। इसमें वेद, स्मृति, पुराण, सदाचार और आत्म-तुष्टि — ये पाँचों मिलकर धर्म के प्रमाण हैं।

मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, पराशरस्मृति, गौतमधर्मसूत्र — इन ग्रन्थों में व्यक्ति से लेकर राजा तक, गृहस्थ से लेकर सन्यासी तक — सबके धर्म का विस्तृत विवेचन है।

🪨 धर्म की परिभाषाएँ
धृ + मन्जो धारण करे — लोक को, समाज को, व्यक्ति को
मनुस्मृतिवेद, स्मृति, सदाचार, आत्म-तुष्टि — ये चार धर्म के प्रमाण
वैशेषिक"यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः" — जिससे अभ्युदय और मोक्ष मिले
महाभारत"धारणाद्धर्ममित्याहुः" — धारण करने के कारण धर्म कहते हैं
प्रमुख ग्रन्थ18+ स्मृतियाँ, 4 धर्मसूत्र
विषयआचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त
रचयितामनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, गौतम
आधारवेद ही धर्म का परम प्रमाण
धर्म अर्थ काम मोक्ष
The Four Goals

चार पुरुषार्थ — मानव जीवन के लक्ष्य

भारतीय जीवन-दर्शन के अनुसार मानव जीवन के चार परम लक्ष्य — इनकी साधना ही सार्थक जीवन है।

⚖️
प्रथम पुरुषार्थ
धर्म
Righteousness & Duty

सृष्टि की व्यवस्था, व्यक्ति के कर्तव्य और नैतिक नियमों का पालन। धर्म ही तीनों पुरुषार्थों (अर्थ, काम, मोक्ष) का आधार है। बिना धर्म के अर्थ और काम दोनों अनर्थकारी हैं।

धर्मो रक्षति रक्षितः — रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है।
💰
द्वितीय पुरुषार्थ
अर्थ
Wealth & Prosperity

धर्मपूर्वक अर्जित धन और भौतिक सम्पदा। जीवन-निर्वाह, परिवार-पोषण, समाज-सेवा और धर्म-कार्यों के लिए धन अनिवार्य है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र इसी का विज्ञान है।

अर्थाद्धर्मश्च कामश्च — अर्थ से ही धर्म और काम सिद्ध होते हैं।
🌸
तृतीय पुरुषार्थ
काम
Desire & Fulfillment

धर्म और अर्थ की सीमाओं में रहकर भोगों, प्रेम और सौंदर्य का उचित उपभोग। काम को दमित करना नहीं, धर्म की सीमाओं में संयमित करना आवश्यक है। वात्स्यायन का कामसूत्र इसी का शास्त्र है।

धर्माविरुद्धो काम — मैं धर्म के विरुद्ध न हो ऐसा काम हूँ।
🕊️
चतुर्थ पुरुषार्थ
मोक्ष
Liberation & Transcendence

जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति — सर्वोच्च पुरुषार्थ। धर्म, अर्थ और काम इसकी तैयारी हैं। उपनिषद, योग और वेदान्त मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। जीवनमुक्ति — जीते-जी मोक्ष।

मोक्षं न हि गच्छन्ति धर्महीना — धर्मरहित व्यक्ति मोक्ष नहीं पाते।
Life Stages

चार आश्रम — जीवन की चार अवस्थाएँ

भारतीय जीवन-विधान में मनुष्य के 100 वर्ष के जीवन को चार भागों में बाँटा गया — प्रत्येक की अपनी जिम्मेदारी।

1
ब्रह्मचर्य
Student Life
0 — 25 वर्ष

गुरुकुल में रहकर वेद, शस्त्र, कला और जीवन-विद्या सीखने का काल। इन्द्रिय-संयम, ब्रह्मचर्य और गुरु-सेवा इस आश्रम का आधार।

गुरु के पास रहकर विद्याध्ययन
इन्द्रिय-संयम और ब्रह्मचर्य पालन
गुरु-सेवा और भिक्षाटन
वेद, व्याकरण, धर्मशास्त्र पठन
2
गृहस्थ
Householder Life
25 — 50 वर्ष

विवाह, परिवार-पोषण, समाज-सेवा और धर्म-कार्यों का काल। चारों आश्रमों में गृहस्थ सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वही शेष तीनों का भरण-पोषण करता है।

पञ्च महायज्ञ का पालन
अतिथि-देव सत्कार
माता-पिता, गुरु की सेवा
धर्मपूर्वक अर्थ-उपार्जन
3
वानप्रस्थ
Retired Life
50 — 75 वर्ष

गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियाँ अगली पीढ़ी को सौंपकर वन में जाकर साधना करने का काल। भोग से वैराग्य की ओर यात्रा।

वन में सात्विक जीवन
यज्ञ, तप, स्वाध्याय
शिष्यों को ज्ञान-दान
भोग-त्याग, इन्द्रिय-निग्रह
4
सन्यास
Renunciation
75 — 100 वर्ष

सम्पूर्ण त्याग और मोक्ष-साधना का काल। कोई नाम, परिवार, सम्पत्ति नहीं। केवल ब्रह्म-चिन्तन। एकदण्डी या त्रिदण्डी संन्यास।

ब्रह्म-चिन्तन और समाधि
भिक्षावृत्ति — अहंकार-त्याग
सब में समदर्शिता
जीवन्मुक्ति की साधना
Social Structure

चार वर्ण — गुण-कर्म आधारित व्यवस्था

वर्ण-व्यवस्था जन्म पर नहीं — गुण और कर्म पर आधारित थी। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं — "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" — चार वर्ण मैंने गुण और कर्म के विभाग से रचे। प्राचीन काल में व्यक्ति अपने गुण और कर्म से वर्ण बदल सकता था।

📖
ब्राह्मण
सत्त्व प्रधान

ज्ञान, अध्यापन, यज्ञ और समाज-मार्गदर्शन का कार्य। सत्य, संयम, शम-दम-तप इनके मुख्य गुण। समाज का बौद्धिक नेतृत्व।

अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान, प्रतिग्रह
⚔️
क्षत्रिय
रजस् प्रधान

समाज की रक्षा, शासन और न्याय का कार्य। शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य, युद्ध से न भागना — क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण।

शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य, युद्धम्, दानम्, ईश्वरभावः
🌾
वैश्य
रज-तम मिश्र

कृषि, व्यापार, गोपालन और अर्थ-व्यवस्था का संचालन। समाज की आर्थिक नींव। धर्मपूर्वक व्यापार वैश्य का धर्म।

कृषि, गोरक्ष्य, वाणिज्य — धर्मपूर्वक अर्थ-उपार्जन
🔧
शूद्र
तमस् प्रधान

शिल्प, सेवा और हस्तकला द्वारा समाज का सहयोग। तीनों वर्णों की सेवा शूद्र का धर्म। शूद्र के बिना समाज अधूरा।

परिचर्या — तीनों वर्णों की सेवा और शिल्प-कार्य
Sacred Texts

प्रमुख धर्मशास्त्र ग्रन्थ

ये स्मृतियाँ वेद-आधारित जीवन-विधान के व्यावहारिक रूप हैं — समयानुसार संशोधनीय।

01
प्रथम स्मृति
मनुस्मृति
Manusmriti • Laws of Manu

सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रभावशाली धर्मशास्त्र। 12 अध्यायों में राजधर्म, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, स्त्रीधर्म, प्रायश्चित्त और दण्डविधि का विस्तृत विवेचन।

अध्याय
12 अध्याय
श्लोक
2,685 श्लोक
रचयिता
मनु / भृगु
काल
200 ईपू — 200 ई.
आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च।
वेद और स्मृति में कहा गया आचार ही परम धर्म है।
02
द्वितीय स्मृति
याज्ञवल्क्यस्मृति
Yajnavalkya Smriti

तीन खण्डों में — आचाराध्याय, व्यवहाराध्याय और प्रायश्चित्ताध्याय। कानूनी प्रक्रिया, साक्ष्य और दण्डविधि के अत्यंत व्यावहारिक नियम। विज्ञानेश्वर की "मिताक्षरा" इसी पर भाष्य है।

खण्ड
3 खण्ड
श्लोक
1,010 श्लोक
प्रसिद्ध भाष्य
मिताक्षरा
विशेष
व्यवहार कानून
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
वेद, स्मृति, सदाचार और आत्म-प्रियता — ये धर्म के लक्षण हैं।
03
तृतीय स्मृति
पराशरस्मृति
Parashara Smriti • For Kali Age

कलियुग के लिए विशेष रूप से रची गई स्मृति। महर्षि पराशर (व्यास के पिता) द्वारा। सरल और व्यावहारिक नियम जो कलियुग की परिस्थितियों में लागू हों।

अध्याय
12 अध्याय
विशेष
कलियुग उपयुक्त
रचयिता
महर्षि पराशर
भाष्य
माधवाचार्य
कृते तु मानवा धर्माः त्रेतायां गौतमाः स्मृताः।
कृतयुग में मनु के, त्रेता में गौतम के, द्वापर में शंख-लिखित के और कलियुग में पराशर के धर्म प्रमाण हैं।
04
चतुर्थ ग्रन्थ
गौतमधर्मसूत्र
Gautama Dharmasutra

सबसे प्राचीन धर्मसूत्रों में से एक। 28 अध्यायों में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ धर्म, प्रायश्चित्त और उत्तराधिकार के नियम। सामवेद परंपरा से सम्बद्ध।

अध्याय
28 अध्याय
सूत्र
1,000+ सूत्र
वेद
सामवेद
काल
600-400 ईपू
वेदो धर्ममूलम्।
वेद ही धर्म का मूल है। — गौतम का प्रथम सूत्र।
05
पञ्चम ग्रन्थ
आपस्तम्बधर्मसूत्र
Apastamba Dharmasutra

आन्ध्र प्रदेश की परंपरा में अत्यंत प्रचलित। कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ जीवन और शिक्षा के नियम अत्यंत व्यावहारिक ढंग से।

प्रश्न
2 प्रश्न, 11 पटल
वेद
कृष्ण यजुर्वेद
क्षेत्र
दक्षिण भारत
काल
600-300 ईपू
सर्वेषां धर्माणां मूलं वेदः।
सभी धर्मों का मूल वेद है।
06
षष्ठ ग्रन्थ
विष्णुस्मृति
Vishnu Smriti

100 अध्यायों में सम्पूर्ण धर्मविधान। दण्डनीति, उत्तराधिकार, शुद्धि और प्रायश्चित्त के नियम। विष्णु भक्ति के साथ धर्म-विधान का अनूठा संगम।

अध्याय
100 अध्याय
श्लोक
243 श्लोक
वेद
कृष्ण यजुर्वेद
विशेष
दण्डनीति
धर्मस्य मूलं अर्थः — अर्थस्य मूलं राज्यम्।
धर्म का मूल अर्थ है, और अर्थ का मूल राज्य-व्यवस्था है।
Characteristics

धर्म के दश लक्षण

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
— मनुस्मृति ६.९२
🏔️
धृति
Fortitude

धैर्य — संकट में धीर रहना, विचलित न होना

🕊️
क्षमा
Forgiveness

क्षमाशीलता — दूसरों की गलतियाँ माफ करना

🧘
दम
Self-Control

बाह्य इन्द्रियों का संयम, मन पर नियंत्रण

🚫
अस्तेय
Non-Stealing

चोरी न करना — विचार, वाणी और कर्म से

💧
शौच
Purity

बाहरी और भीतरी पवित्रता — देह और मन की

इन्द्रिय-निग्रह
Sense Control

पाँचों इन्द्रियों को वश में रखना

💡
धी
Wisdom

बुद्धि की प्रखरता, विवेकशक्ति

📚
विद्या
Knowledge

ज्ञान — आत्मज्ञान और शास्त्र-ज्ञान

🌟
सत्य
Truth

सत्य वाणी — जो जाना, देखा, वही बोलना

🌊
अक्रोध
Non-Anger

क्रोध-रहितता — उकसावे पर भी शान्त रहना

Life Sacraments

षोडश संस्कार — जीवन के सोलह संस्कार

गर्भाधान से मृत्यु तक — 16 संस्कार जीवन को पवित्र और अर्थपूर्ण बनाते हैं।

गर्भावस्था के संस्कार
1
गर्भाधान
गर्भ धारण का शुभ संस्कार — सन्तति के लिए ईश्वर प्रार्थना
2
पुंसवन
गर्भ-रक्षा और शिशु-स्वास्थ्य के लिए। तीसरे माह में।
3
सीमन्तोन्नयन
माता के मन को प्रसन्न रखने का संस्कार। चौथे-पाँचवें माह में।
4
जातकर्म
जन्म के तुरन्त बाद। स्वर्ण-मधु चटाना, मेधा-जनन।
बाल्यावस्था के संस्कार
5
नामकरण
जन्म के 10वें-12वें दिन। नाम-चयन के विशेष नियम।
6
निष्क्रमण
प्रथम बार शिशु को घर से बाहर ले जाना। चौथे माह में।
7
अन्नप्राशन
प्रथम बार अन्न खिलाना। छठे-सातवें माह में।
8
चूडाकर्म
प्रथम मुण्डन — पहले या तीसरे वर्ष में।
शिक्षा के संस्कार
9
कर्णवेध
कान छेदन — आयुर्वेद और रक्षा का वैज्ञानिक महत्व।
10
विद्यारम्भ
लेखन-पठन का आरम्भ। माँ सरस्वती की पूजा।
11
उपनयन
सर्वाधिक महत्वपूर्ण — गुरुकुल प्रवेश। यज्ञोपवीत धारण।
12
वेदारम्भ
वेद-अध्ययन का शुभारम्भ। गुरु की देखरेख में।
वयस्क जीवन के संस्कार
13
केशान्त
विद्याध्ययन पूर्ण होने पर प्रथम क्षौर-कर्म। गुरुकुल-विसर्जन।
14
समावर्तन
गुरुकुल से गृह-वापसी। स्नातक की उपाधि।
15
विवाह
गृहस्थाश्रम में प्रवेश। सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संस्कार।
16
अन्त्येष्टि
मृत्यु के बाद — दाह-संस्कार। अंतिम संस्कार।
Five Daily Duties

पञ्च महायज्ञ — गृहस्थ के पाँच दैनिक कर्तव्य

प्रत्येक गृहस्थ को प्रतिदिन ये पाँच यज्ञ करने चाहिए — अन्यथा वह पाँच प्रकार के पापों का भागी होता है।

📖
ब्रह्मयज्ञ
ऋषि-ऋण

वेद का स्वाध्याय और पठन-पाठन। ऋषियों के प्रति कृतज्ञता। ज्ञान को आगे बढ़ाना।

🔥
देवयज्ञ
देव-ऋण

अग्निहोत्र — अग्नि में आहुति। पञ्चभूतों और देवताओं के प्रति कृतज्ञता।

💧
पितृयज्ञ
पितृ-ऋण

जल-तर्पण — पूर्वजों की स्मृति। माता-पिता की सेवा। श्राद्ध-कर्म।

🌾
भूतयज्ञ
प्राणि-ऋण

बलिवैश्वदेव — पशु-पक्षी, कीट आदि प्राणियों को भोजन। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता।

🏠
मनुष्ययज्ञ
मानव-ऋण

अतिथि-सत्कार — बिना बुलाए आए अतिथि को भोजन। "अतिथि देवो भव।"

Primary Sources

चार प्रमुख धर्मसूत्र

स्मृतियों से पुरानी — धर्मसूत्र परंपरा सबसे प्राचीन विधि-ग्रन्थ हैं।

📿
प्रथम धर्मसूत्र
आपस्तम्बधर्मसूत्र
Apastamba • ~600-300 BCE

कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से। 2 प्रश्नों में विद्यार्थी से सन्यासी तक के धर्म। दक्षिण भारत में आज भी मानक। भोजन, यज्ञ और विवाह के विस्तृत नियम।

⚖️
द्वितीय धर्मसूत्र
बौधायनधर्मसूत्र
Baudhayana • ~800-500 BCE

सबसे प्राचीन धर्मसूत्रों में से एक। कर्नाटक और आन्ध्र में प्रचलित। श्राद्ध, शुद्धि और प्रायश्चित्त के विस्तृत नियम। ज्यामिति (शुल्बसूत्र) के लिए भी प्रसिद्ध।

🏛️
तृतीय धर्मसूत्र
वसिष्ठधर्मसूत्र
Vasishtha • ~300-100 BCE

महर्षि वशिष्ठ से सम्बद्ध। ऋग्वेद परंपरा। 30 अध्यायों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के धर्म। स्त्री-धर्म, विधवा-धर्म और प्रायश्चित्त के नियम।

🎯
चतुर्थ धर्मसूत्र
गौतमधर्मसूत्र
Gautama • ~600-400 BCE

सामवेद परंपरा। 28 अध्यायों में धर्म-नियम। "वेदो धर्ममूलम्" — इसी सूत्र से आरम्भ। न्याय-दर्शन के महर्षि गौतम से भिन्न। उत्तराधिकार के नियम उल्लेखनीय।

❧ ❧ ❧
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।

सभी सुखी हों। सभी रोग-मुक्त हों। सभी शुभ देखें। कोई भी दुःख का भागी न हो।

— बृहदारण्यकोपनिषद • धर्म की सार्वभौम प्रार्थना

Modern Relevance

आज के युग में धर्म शास्त्र

प्राचीन धर्म-विधान आधुनिक समस्याओं के समाधान में कितना प्रासंगिक है

⚖️
आधुनिक विधि

भारतीय संविधान और व्यक्तिगत कानूनों में धर्मशास्त्र का प्रभाव। हिन्दू विवाह अधिनियम, उत्तराधिकार कानून — मिताक्षरा और दायभाग परंपरा से आए।

🌍
पर्यावरण धर्म

भूतयज्ञ, वृक्ष-पूजा, नदी-माता — धर्मशास्त्र प्रकृति-संरक्षण को धार्मिक कर्तव्य मानता है। आधुनिक पर्यावरण संकट का समाधान यहीं है।

👨‍👩‍👧‍👦
परिवार व्यवस्था

आश्रम-व्यवस्था और संस्कार-परंपरा — परिवार को टूटने से बचाती है। माता-पिता-सेवा, अतिथि-सत्कार — सामाजिक एकता के सूत्र।

🧠
मानसिक स्वास्थ्य

धर्म के दश लक्षण — क्षमा, शांति, सत्य, अक्रोध — आधुनिक मनोविज्ञान के CBT और Mindfulness के आधार। धर्म-पालन तनाव कम करता है।

💼
व्यावसायिक नीति

धर्मपूर्वक अर्थ-उपार्जन — आधुनिक Business Ethics का आधार। "अर्थस्य मूलं धर्मः" — नैतिक व्यवसाय ही दीर्घकालिक सफलता देता है।

🏫
शिक्षा व्यवस्था

उपनयन और गुरुकुल परंपरा — शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, चरित्र-निर्माण। आधुनिक शिक्षा में मूल्य-आधारित शिक्षा की कमी यही समाधान देती है।

Questions

प्रश्नोत्तर

धर्म शास्त्र के बारे में सामान्य प्रश्न

धर्म और रिलीजन (Religion) में क्या अंतर है?

+
Religion का अनुवाद "धर्म" नहीं है। Religion एक मत-सम्प्रदाय है — किसी विशेष पुस्तक या पैगम्बर पर आस्था। धर्म सार्वभौम है — वह किसी एक व्यक्ति या पुस्तक से नहीं बंधा। "सत्य बोलना", "हिंसा न करना", "माता-पिता की सेवा" — ये सभी के लिए धर्म हैं। Religion बदल सकते हैं, धर्म नहीं बदलता।

वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था में क्या अंतर है?

+
वर्ण-व्यवस्था गुण-कर्म आधारित थी — जन्म पर नहीं। विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे पर ब्राह्मण बने। ऐलूष जन्म से शूद्र थे पर ऋग्वेद के ऋषि बने। जाति-व्यवस्था बाद में आई — जन्म-आधारित, कठोर और भेदभावपूर्ण। यह धर्मशास्त्र का विकृत रूप है। मूल वर्ण-व्यवस्था में समानता और गतिशीलता थी।

मनुस्मृति के बारे में इतना विवाद क्यों है?

+
मनुस्मृति में बाद में बहुत सारे प्रक्षेप (interpolations) हुए। मूल मनुस्मृति में कई जगह स्त्री और शूद्र के लिए उच्च स्थान दिया गया है। डॉ. सुरेन्द्रकुमार ने "विशुद्ध मनुस्मृति" में प्रक्षिप्त श्लोकों को अलग किया। किसी भी ग्रन्थ को उसके मूल रूप में समझना चाहिए, न कि विकृत अनुवादों से।

धर्म शास्त्र में स्त्रियों का क्या स्थान था?

+
  • वैदिक काल में स्त्रियाँ वेद पढ़ती थीं — गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा वेद-ऋषिकाएँ थीं
  • "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" — मनुस्मृति
  • गृहस्थ आश्रम में पत्नी को "अर्धांगिनी" — आधा शरीर माना गया
  • स्त्री-शिक्षा, स्त्री-धर्म और स्त्री-उत्तराधिकार के विशेष प्रावधान थे
  • कालान्तर में बाहरी आक्रमणों के कारण स्त्री की स्वतन्त्रता संकुचित हुई

आज के हिन्दू को कौन से धर्मशास्त्र का पालन करना चाहिए?

+
पराशर स्मृति ने स्पष्ट कहा है — कलियुग में पराशर स्मृति के नियम प्रमाण हैं। लेकिन सामान्य नियम यह है:
  • जो काल, देश और परिस्थिति के अनुकूल हो
  • जो वेद की भावना के विरुद्ध न हो
  • जो समाज के बहुमत के लिए कल्याणकारी हो
  • जिसे सज्जन और विद्वान स्वीकार करें
महात्माओं का आचरण ही सर्वोत्तम मार्गदर्शन है।

राजधर्म क्या है?

+
राजधर्म वह धर्म है जो राजा (शासक) पर लागू होता है। मनुस्मृति और महाभारत के शान्तिपर्व में विस्तार से दिया है। मुख्य नियम: प्रजा की रक्षा करना, न्यायपूर्वक दण्ड देना, कर-संग्रह उचित रीति से करना, देश की सीमाओं की रक्षा करना, और स्वयं धर्म का पालन करना। "राजा कालस्य कारणम्" — राजा के आचरण से ही काल (समय) की गुणवत्ता निर्धारित होती है।