Gurukul Vidya Series • गुरुकुल विद्या
सनातन जीवन-विधान
"धर्म नष्ट करने पर स्वयं को नष्ट कर देता है, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश मत करो।" — मनुस्मृति
धर्म — संस्कृत की "धृ" धातु से जन्मा शब्द जिसका अर्थ है "धारण करना"। धर्म वह है जो व्यक्ति, समाज और ब्रह्माण्ड को धारण करता है — जो इसे बाँधे रखता है, संचालित करता है और उन्नत करता है।
धर्म शास्त्र वह विद्या है जो मानव जीवन के उचित आचरण, सामाजिक व्यवस्था और आत्मिक उत्थान के नियम निर्धारित करती है। इसमें वेद, स्मृति, पुराण, सदाचार और आत्म-तुष्टि — ये पाँचों मिलकर धर्म के प्रमाण हैं।
मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, पराशरस्मृति, गौतमधर्मसूत्र — इन ग्रन्थों में व्यक्ति से लेकर राजा तक, गृहस्थ से लेकर सन्यासी तक — सबके धर्म का विस्तृत विवेचन है।
भारतीय जीवन-दर्शन के अनुसार मानव जीवन के चार परम लक्ष्य — इनकी साधना ही सार्थक जीवन है।
सृष्टि की व्यवस्था, व्यक्ति के कर्तव्य और नैतिक नियमों का पालन। धर्म ही तीनों पुरुषार्थों (अर्थ, काम, मोक्ष) का आधार है। बिना धर्म के अर्थ और काम दोनों अनर्थकारी हैं।
धर्मपूर्वक अर्जित धन और भौतिक सम्पदा। जीवन-निर्वाह, परिवार-पोषण, समाज-सेवा और धर्म-कार्यों के लिए धन अनिवार्य है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र इसी का विज्ञान है।
धर्म और अर्थ की सीमाओं में रहकर भोगों, प्रेम और सौंदर्य का उचित उपभोग। काम को दमित करना नहीं, धर्म की सीमाओं में संयमित करना आवश्यक है। वात्स्यायन का कामसूत्र इसी का शास्त्र है।
जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति — सर्वोच्च पुरुषार्थ। धर्म, अर्थ और काम इसकी तैयारी हैं। उपनिषद, योग और वेदान्त मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। जीवनमुक्ति — जीते-जी मोक्ष।
भारतीय जीवन-विधान में मनुष्य के 100 वर्ष के जीवन को चार भागों में बाँटा गया — प्रत्येक की अपनी जिम्मेदारी।
गुरुकुल में रहकर वेद, शस्त्र, कला और जीवन-विद्या सीखने का काल। इन्द्रिय-संयम, ब्रह्मचर्य और गुरु-सेवा इस आश्रम का आधार।
विवाह, परिवार-पोषण, समाज-सेवा और धर्म-कार्यों का काल। चारों आश्रमों में गृहस्थ सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वही शेष तीनों का भरण-पोषण करता है।
गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियाँ अगली पीढ़ी को सौंपकर वन में जाकर साधना करने का काल। भोग से वैराग्य की ओर यात्रा।
सम्पूर्ण त्याग और मोक्ष-साधना का काल। कोई नाम, परिवार, सम्पत्ति नहीं। केवल ब्रह्म-चिन्तन। एकदण्डी या त्रिदण्डी संन्यास।
वर्ण-व्यवस्था जन्म पर नहीं — गुण और कर्म पर आधारित थी। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं — "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" — चार वर्ण मैंने गुण और कर्म के विभाग से रचे। प्राचीन काल में व्यक्ति अपने गुण और कर्म से वर्ण बदल सकता था।
ज्ञान, अध्यापन, यज्ञ और समाज-मार्गदर्शन का कार्य। सत्य, संयम, शम-दम-तप इनके मुख्य गुण। समाज का बौद्धिक नेतृत्व।
समाज की रक्षा, शासन और न्याय का कार्य। शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य, युद्ध से न भागना — क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण।
कृषि, व्यापार, गोपालन और अर्थ-व्यवस्था का संचालन। समाज की आर्थिक नींव। धर्मपूर्वक व्यापार वैश्य का धर्म।
शिल्प, सेवा और हस्तकला द्वारा समाज का सहयोग। तीनों वर्णों की सेवा शूद्र का धर्म। शूद्र के बिना समाज अधूरा।
ये स्मृतियाँ वेद-आधारित जीवन-विधान के व्यावहारिक रूप हैं — समयानुसार संशोधनीय।
सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रभावशाली धर्मशास्त्र। 12 अध्यायों में राजधर्म, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, स्त्रीधर्म, प्रायश्चित्त और दण्डविधि का विस्तृत विवेचन।
तीन खण्डों में — आचाराध्याय, व्यवहाराध्याय और प्रायश्चित्ताध्याय। कानूनी प्रक्रिया, साक्ष्य और दण्डविधि के अत्यंत व्यावहारिक नियम। विज्ञानेश्वर की "मिताक्षरा" इसी पर भाष्य है।
कलियुग के लिए विशेष रूप से रची गई स्मृति। महर्षि पराशर (व्यास के पिता) द्वारा। सरल और व्यावहारिक नियम जो कलियुग की परिस्थितियों में लागू हों।
सबसे प्राचीन धर्मसूत्रों में से एक। 28 अध्यायों में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ धर्म, प्रायश्चित्त और उत्तराधिकार के नियम। सामवेद परंपरा से सम्बद्ध।
आन्ध्र प्रदेश की परंपरा में अत्यंत प्रचलित। कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ जीवन और शिक्षा के नियम अत्यंत व्यावहारिक ढंग से।
100 अध्यायों में सम्पूर्ण धर्मविधान। दण्डनीति, उत्तराधिकार, शुद्धि और प्रायश्चित्त के नियम। विष्णु भक्ति के साथ धर्म-विधान का अनूठा संगम।
धैर्य — संकट में धीर रहना, विचलित न होना
क्षमाशीलता — दूसरों की गलतियाँ माफ करना
बाह्य इन्द्रियों का संयम, मन पर नियंत्रण
चोरी न करना — विचार, वाणी और कर्म से
बाहरी और भीतरी पवित्रता — देह और मन की
पाँचों इन्द्रियों को वश में रखना
बुद्धि की प्रखरता, विवेकशक्ति
ज्ञान — आत्मज्ञान और शास्त्र-ज्ञान
सत्य वाणी — जो जाना, देखा, वही बोलना
क्रोध-रहितता — उकसावे पर भी शान्त रहना
गर्भाधान से मृत्यु तक — 16 संस्कार जीवन को पवित्र और अर्थपूर्ण बनाते हैं।
प्रत्येक गृहस्थ को प्रतिदिन ये पाँच यज्ञ करने चाहिए — अन्यथा वह पाँच प्रकार के पापों का भागी होता है।
वेद का स्वाध्याय और पठन-पाठन। ऋषियों के प्रति कृतज्ञता। ज्ञान को आगे बढ़ाना।
अग्निहोत्र — अग्नि में आहुति। पञ्चभूतों और देवताओं के प्रति कृतज्ञता।
जल-तर्पण — पूर्वजों की स्मृति। माता-पिता की सेवा। श्राद्ध-कर्म।
बलिवैश्वदेव — पशु-पक्षी, कीट आदि प्राणियों को भोजन। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता।
अतिथि-सत्कार — बिना बुलाए आए अतिथि को भोजन। "अतिथि देवो भव।"
स्मृतियों से पुरानी — धर्मसूत्र परंपरा सबसे प्राचीन विधि-ग्रन्थ हैं।
कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से। 2 प्रश्नों में विद्यार्थी से सन्यासी तक के धर्म। दक्षिण भारत में आज भी मानक। भोजन, यज्ञ और विवाह के विस्तृत नियम।
सबसे प्राचीन धर्मसूत्रों में से एक। कर्नाटक और आन्ध्र में प्रचलित। श्राद्ध, शुद्धि और प्रायश्चित्त के विस्तृत नियम। ज्यामिति (शुल्बसूत्र) के लिए भी प्रसिद्ध।
महर्षि वशिष्ठ से सम्बद्ध। ऋग्वेद परंपरा। 30 अध्यायों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के धर्म। स्त्री-धर्म, विधवा-धर्म और प्रायश्चित्त के नियम।
सामवेद परंपरा। 28 अध्यायों में धर्म-नियम। "वेदो धर्ममूलम्" — इसी सूत्र से आरम्भ। न्याय-दर्शन के महर्षि गौतम से भिन्न। उत्तराधिकार के नियम उल्लेखनीय।
प्राचीन धर्म-विधान आधुनिक समस्याओं के समाधान में कितना प्रासंगिक है
भारतीय संविधान और व्यक्तिगत कानूनों में धर्मशास्त्र का प्रभाव। हिन्दू विवाह अधिनियम, उत्तराधिकार कानून — मिताक्षरा और दायभाग परंपरा से आए।
भूतयज्ञ, वृक्ष-पूजा, नदी-माता — धर्मशास्त्र प्रकृति-संरक्षण को धार्मिक कर्तव्य मानता है। आधुनिक पर्यावरण संकट का समाधान यहीं है।
आश्रम-व्यवस्था और संस्कार-परंपरा — परिवार को टूटने से बचाती है। माता-पिता-सेवा, अतिथि-सत्कार — सामाजिक एकता के सूत्र।
धर्म के दश लक्षण — क्षमा, शांति, सत्य, अक्रोध — आधुनिक मनोविज्ञान के CBT और Mindfulness के आधार। धर्म-पालन तनाव कम करता है।
धर्मपूर्वक अर्थ-उपार्जन — आधुनिक Business Ethics का आधार। "अर्थस्य मूलं धर्मः" — नैतिक व्यवसाय ही दीर्घकालिक सफलता देता है।
उपनयन और गुरुकुल परंपरा — शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, चरित्र-निर्माण। आधुनिक शिक्षा में मूल्य-आधारित शिक्षा की कमी यही समाधान देती है।
धर्म शास्त्र के बारे में सामान्य प्रश्न