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गौ-धन ज्ञानकोश

भारत की देशी गाय की नस्लें

दूध देने वाली, भार ढोने वाली और दोहरे प्रयोजन की — भारत के हर कोने से देशी गोवंश की तस्वीरों और जानकारी के साथ एक झलक।

42नस्लें सूचीबद्ध
60+कुल मान्यता प्राप्त नस्लें भारत में
4प्रमुख वर्गीकरण

देशी गोवंश क्यों जरूरी हैं?

भारत में लगभग 60 मान्यता प्राप्त देशी गाय नस्लें पाई जाती हैं, जिनमें से कई आज विलुप्ति के कगार पर हैं। इन्हें मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जाता है — दुधारू नस्लें (जैसे गिर, साहीवाल, राठी, लाल सिंधी), दोहरे प्रयोजन की नस्लें (दूध व भारवहन दोनों के लिए, जैसे हरियाणवी, कांकरेज, ओंगोल) और भारवाहक नस्लें (मुख्यतः खेती-किसानी के काम के लिए, जैसे हल्लीकर, खिल्लारी, अमृतमहल)। इसके अलावा वेचूर, पुंगनूर और मालनाड गिड्डा जैसी बौनी नस्लें भी हैं, जो आकार में छोटी लेकिन गुणों में समृद्ध मानी जाती हैं।

देशी नस्लें विदेशी नस्लों की तुलना में स्थानीय जलवायु और परिस्थितियों में बेहतर ढल जाती हैं, बीमारियों से लड़ने की क्षमता ज्यादा रखती हैं और कम संसाधनों में भी अच्छी तरह पल जाती हैं। नीचे दी गई सूची में भारत की प्रमुख देशी गाय नस्लों को उनकी तस्वीर, क्षेत्र, दुग्ध क्षमता और खासियत के साथ दिखाया गया है — नाम या क्षेत्र लिखकर खोजें, या श्रेणी के अनुसार छाँटें।

गिर गाय की तस्वीर दुधारू नस्ल

गिर

स्थानगुजरात (सौराष्ट्र, जूनागढ़, भावनगर, अमरेली)

दूधप्रतिदिन 15-30 लीटर तक (सालाना 2000-6000 किलोग्राम)

गिर को भारत की सबसे अधिक दूध देने वाली देशी नस्लों में गिना जाता है। इसकी पहचान झुके हुए बड़े सींगों, लटकते कानों और शरीर पर लाल-सफेद या काले धब्बों से होती है। गुजरात के गिर जंगल के नाम पर पड़ा इसका नाम अब देश-विदेश में मशहूर है; ब्राज़ील और इज़राइल में भी इस नस्ल को खासतौर पर पाला जाता है।

साहीवाल गाय की तस्वीर दुधारू नस्ल

साहीवाल

स्थानपंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश

दूधसालाना लगभग 2000-4000 किलोग्राम

साहीवाल को भारत की सर्वश्रेष्ठ दुधारू नस्लों में गिना जाता है। शांत स्वभाव और बीमारियों से लड़ने की अच्छी क्षमता के कारण डेयरी किसानों में यह बेहद लोकप्रिय है। ब्याने के बाद यह करीब 10 महीने तक लगातार दूध देती है और अलग-अलग जलवायु में भी आसानी से ढल जाती है।

लाल सिंधी (रेड सिंधी) गाय की तस्वीर दुधारू नस्ल

लाल सिंधी (रेड सिंधी)

स्थानमूल रूप से सिंध (अब पाकिस्तान); आज पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, ओडिशा

दूधसालाना लगभग 1100-2600 किलोग्राम

गहरे लाल रंग के कारण इस नस्ल को लाल सिंधी कहा जाता है। यह साहीवाल की तरह ही अच्छी दुधारू नस्ल है और गर्म व उमस भरे मौसम को भी अच्छी तरह सहन कर लेती है। इसकी सहनशक्ति और रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कारण इसे दुनिया के कई हिस्सों में डेयरी सुधार के लिए इस्तेमाल किया गया है।

राठी गाय की तस्वीर दुधारू नस्ल

राठी

स्थानराजस्थान (गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर)

दूधसालाना लगभग 1800-3500 किलोग्राम

राठी नस्ल का नाम राजस्थान की राठस जनजाति के नाम पर पड़ा है। यह नस्ल थार के रेगिस्तानी इलाकों में कम पानी और चारे में भी अच्छा दूध देने के लिए जानी जाती है, इसलिए इसे रेगिस्तान की श्रेष्ठ दुधारू नस्ल कहा जाता है।

थारपारकर गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल (दूध व भारवहन)

थारपारकर

स्थानसिंध (पाकिस्तान), कच्छ, जैसलमेर, जोधपुर

दूधसालाना लगभग 913-2146 किलोग्राम

राजस्थान में इसे 'मालाणी नस्ल' भी कहा जाता है, क्योंकि इसका मूल स्थान बाड़मेर का मालाणी क्षेत्र माना जाता है। यह भारत की सबसे अच्छी दुधारू नस्लों में शुमार है और साथ ही इसके बैल हल-जुताई के काम में भी सक्षम होते हैं। सफेद या हल्के भूरे रंग की यह नस्ल कठिन रेगिस्तानी परिस्थितियों में भी अच्छी तरह पलती है।

कांकरेज गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल (दूध व भारवहन)

कांकरेज

स्थानगुजरात (कच्छ, मेहसाणा), राजस्थान (बाड़मेर, जोधपुर)

दूधसालाना लगभग 1500-4000 किलोग्राम

कांकरेज गोवंश का मुँह छोटा-चौड़ा और सींग लंबे व चंद्राकार होते हैं। इसकी गायें अच्छी मात्रा में दूध देती हैं और इसके बैल भारी बोझ खींचने में भी दक्ष होते हैं, इसी वजह से इसे 'द्वि-प्रयोजनीय नस्ल' कहा जाता है।

हरियाणवी (हरियाणा) गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल (दूध व भारवहन)

हरियाणवी (हरियाणा)

स्थानहरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान

दूधसालाना लगभग 1000-2000 किलोग्राम

सफेद रंग की यह नस्ल अपने मजबूत बैलों के लिए विशेष रूप से जानी जाती है, जो खेती के भारी काम में बहुत उपयोगी माने जाते हैं। साथ ही इसकी गायों का दूध उत्पादन भी संतोषजनक होता है, इसलिए इसे किसानों के लिए बहुउपयोगी नस्ल कहा जाता है।

देवनी (देवनी) गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल (दूध व भारवहन)

देवनी (देवनी)

स्थानमराठवाड़ा (महाराष्ट्र), आंध्र प्रदेश व कर्नाटक के सीमावर्ती क्षेत्र

दूधसालाना लगभग 638-1229 किलोग्राम

देवनी नस्ल की बनावट काफी हद तक गिर नस्ल से मिलती-जुलती है। इसके बैल भारी बोझ ढोने में सक्षम होते हैं जबकि गायें भी अच्छी दुधारू मानी जाती हैं, इसलिए इसे दोहरे प्रयोजन की नस्ल कहा जाता है।

नागौरी गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

नागौरी

स्थानराजस्थान (नागौर जिला)

दूधसालाना लगभग 479-905 किलोग्राम

नागौरी बैल अपनी तेज़ चाल और भार ढोने की खास क्षमता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। इन्हें अक्सर सजावटी सामान पहनाकर मेलों में भी प्रदर्शित किया जाता है, जबकि गायों से सामान्य मात्रा में दूध मिलता है।

नीमाड़ी (निमाड़ी) गाय की तस्वीर भारवाहक/दुधारू नस्ल

नीमाड़ी (निमाड़ी)

स्थानमध्य प्रदेश (खंडवा, खरगोन, बड़वानी)

दूधसालाना लगभग 600-954 किलोग्राम

नीमाड़ी गोवंश फुर्तीला होता है और इसकी मुँह की बनावट गिर नस्ल जैसी होती है। शरीर का रंग लाल होता है जिस पर जगह-जगह सफेद धब्बे पाए जाते हैं, और यह दूध उत्पादन के मामले में भी एक अच्छी नस्ल मानी जाती है।

सीरी गाय की तस्वीर भारवाहक/पहाड़ी नस्ल

सीरी

स्थानदार्जिलिंग की पहाड़ियाँ, सिक्किम; मूल स्थान भूटान

दूधसालाना लगभग 425.8 किलोग्राम

सीरी नस्ल के पशु प्रायः काले-सफेद या लाल-सफेद रंग के और देखने में भारी-भरकम होते हैं। पहाड़ी इलाकों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में यह नस्ल बड़ी सहजता से ढल जाती है।

मेवाती गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल

मेवाती

स्थानराजस्थान (अलवर, भरतपुर), हरियाणा

दूधसालाना लगभग 958 किलोग्राम

मेवाती गोवंश सीधे स्वभाव का होता है और खेती के कामों में खूब उपयोग होता है। इसमें गिर नस्ल जैसे कुछ लक्षण पाए जाते हैं और इसके पैर सामान्य से कुछ ऊँचे होते हैं; गायें अपेक्षाकृत अच्छी दुधारू मानी जाती हैं।

हल्लीकर गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

हल्लीकर

स्थानहासन, मैसूर, तुमकुर (कर्नाटक)

दूधसालाना लगभग 227-1134 किलोग्राम

हल्लीकर कर्नाटक की सबसे पुरानी और मजबूत भारवाहक नस्लों में से एक है। इसके बैल तेज़-तर्रार और फुर्तीले होते हैं, इसी वजह से गाड़ी खींचने व खेती के भारी काम के लिए इन्हें खास तौर पर पाला जाता है।

अमृतमहल गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

अमृतमहल

स्थानकर्नाटक (हासन, चिकमगलूर, चित्रदुर्ग)

दूधसालाना लगभग 1000-1200 किलोग्राम

अमृतमहल बैल मध्यम कद के, फुर्तीले और लंबी दूरी तक तेज़ चलने की क्षमता रखने वाले होते हैं। ऐतिहासिक रूप से मैसूर के राजाओं की सेना में सामान ढोने के लिए इस नस्ल का उपयोग किया जाता था; गायें दूध कम देती हैं।

खिल्लारी गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

खिल्लारी

स्थानदक्षिणी महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक, मध्य प्रदेश

दूधसालाना लगभग 240-515 किलोग्राम

खिल्लारी के बैल बहुत ताकतवर और तेज़ चलने वाले माने जाते हैं, जिस कारण इन्हें बैलगाड़ी दौड़ (जैसे खेतों की सामान ढुलाई) के लिए खासतौर पर पसंद किया जाता है। इसकी गायों में दूध देने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है।

डांगी गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

डांगी

स्थानपश्चिमी महाराष्ट्र (नासिक, अहमदनगर)

दूधसालाना लगभग 175-800 किलोग्राम

डांगी गोवंश भारी बारिश वाले क्षेत्रों में पलने के लिए अनुकूलित है और कीचड़ भरे खेतों में हल जोतने में सक्षम माना जाता है। इसका रंग लाल, काला व सफेद मिश्रित होता है और यह दूध कम देती है।

मालवी गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

मालवी

स्थानमध्य प्रदेश (देवास, उज्जैन, शाजापुर), राजस्थान (झालावाड़)

दूधसालाना लगभग 627-1227 किलोग्राम

मालवी बैलों का उपयोग मुख्य रूप से खेती और सड़कों पर हल्की गाड़ी खींचने के लिए किया जाता है। इनका रंग लाल-खाकी होता है जबकि गर्दन का हिस्सा काले रंग का होता है; इस नस्ल की गायें दूध कम देती हैं।

गावलाव (गाओलाओ) गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल

गावलाव (गाओलाओ)

स्थानमहाराष्ट्र (वर्धा), मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़

दूधसालाना लगभग 470-725 किलोग्राम

गावलाव को एक बेहतरीन नस्ल माना जाता है, जिसका रंग प्रायः सफेद और गलकंबल (गले की लटकती खाल) बड़ा होता है। इसके बैल भार ढोने में सक्षम होते हैं और गायों का दूध उत्पादन भी संतोषजनक रहता है।

वेचूर गाय की तस्वीर बौनी (सबसे छोटी) नस्ल

वेचूर

स्थानकेरल (वैकम, कोट्टायम)

दूधसालाना लगभग 800-915 किलोग्राम

वेचूर दुनिया की सबसे छोटे कद की गाय नस्लों में गिनी जाती है, लेकिन इसके शरीर के आकार के हिसाब से इसका दूध उत्पादन बहुत अच्छा माना जाता है। यह रोगों के प्रति खासी प्रतिरोधी है और बहुत कम खर्च में इसे पाला जा सकता है, इसलिए छोटे व सीमांत किसानों के लिए यह उपयुक्त मानी जाती है।

बरगूर गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

बरगूर

स्थानतमिलनाडु (इरोड जिला, बरगुर पहाड़ियाँ)

दूधसालाना लगभग 250-1300 किलोग्राम

बरगूर नस्ल तमिलनाडु की बरगुर पहाड़ियों की मूल निवासी है। इसका सिर लंबा, पूँछ छोटी और मस्तक उभरा हुआ होता है; इसके बैल बहुत तेज़ चलते हैं जबकि गायों की दूध देने की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

कृष्णा वैली गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

कृष्णा वैली

स्थानमहाराष्ट्र-आंध्र प्रदेश की सीमा (कृष्णा नदी घाटी)

दूधसालाना लगभग 500-913 किलोग्राम

इस नस्ल का मुँह बड़ा तथा सींग व पूँछ अपेक्षाकृत छोटे होते हैं। इसके बैल भारी वजन खींचने में सक्षम माने जाते हैं और गायों से भी ठीक-ठाक दूध मिल जाता है।

कंगायम गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

कंगायम

स्थानतमिलनाडु (कोयंबटूर, इरोड)

दूधसालाना लगभग 500-540 किलोग्राम

कंगायम नस्ल के पशु फुर्तीले और तेज़ चाल वाले होते हैं। दूध कम देने के बावजूद यह गाय लगातार 10-12 वर्षों तक ब्याती और दूध देती रहती है, जिससे यह पशुपालकों के लिए लंबे समय तक लाभदायक बनी रहती है।

ओंगोल गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल

ओंगोल

स्थानआंध्र प्रदेश (गुंटूर, ओंगोल, नेल्लोर)

दूधसालाना लगभग 700-798 किलोग्राम

ओंगोल नस्ल को नेल्लोर के नाम से भी जाना जाता है। इसके बैल भारी शरीर के और बेहद ताकतवर होते हैं और सूखा चारा खाकर भी आसानी से जीवित रह सकते हैं। इस नस्ल की उत्कृष्ट भारवहन क्षमता के कारण ब्राज़ील में भी इस पर व्यापक स्तर पर काम किया गया, जहाँ इससे नेलोर (Nelore) नस्ल विकसित हुई।

बचौर गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

बचौर

स्थानबिहार (सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा)

दूधसालाना लगभग 225-630 किलोग्राम

बचौर गोवंश का उपयोग मुख्यतः खेतों में हल जोतने के लिए किया जाता है। इनका रंग खाकी, ललाट चौड़ा, आँखें बड़ी और कान लटकते हुए होते हैं।

खेरीगढ़ गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

खेरीगढ़

स्थानउत्तर प्रदेश (लखीमपुर खीरी)

दूधसालाना लगभग 300-500 किलोग्राम

खेरीगढ़ नस्ल की गायों के शरीर का रंग सफेद होता है और सींग बड़े होते हैं। इसके बैल फुर्तीले माने जाते हैं और खुले मैदानों में स्वच्छंद रूप से चरने पर स्वस्थ व प्रसन्न रहते हैं; इस नस्ल की गायें दूध कम देती हैं।

कैंकथा (केन्काठा) गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

कैंकथा (केन्काठा)

स्थानउत्तर प्रदेश (ललितपुर, हमीरपुर, बांदा), मध्य प्रदेश (टीकमगढ़)

दूधसालाना लगभग 1-3 किलोग्राम (नाममात्र दुग्ध उत्पादन)

केन नदी के किनारे पाए जाने के कारण इस नस्ल का नाम केनवारिया/कैंकथा पड़ा। इनके सींग कांकरेज नस्ल जैसे होते हैं और यह मुख्यतः खेती व भार ढोने के काम में इस्तेमाल होती है; इसकी गायें दूध बहुत कम देती हैं।

धन्नी गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

धन्नी

स्थानपंजाब

दूधसालाना लगभग 1133 किलोग्राम

धन्नी नस्ल के पशु बहुत फुर्तीले होते हैं और पंजाब के कई हिस्सों में इन्हें हल्की गाड़ियाँ खींचने के लिए पाला जाता है। पारंपरिक रूप से इस नस्ल में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, इसलिए इसकी गायें दुधारू नहीं मानी जातीं।

भगनारी गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल (ज़ेबू नस्लों में श्रेष्ठ मानी जाती है)

भगनारी

स्थानमूल रूप से सिंध (नारी नदी क्षेत्र); पंजाब में भी पाई जाती है

दूधसालाना लगभग 1400 किलोग्राम

नारी नदी के किनारे पाए जाने के कारण इस नस्ल का नाम भगनारी पड़ा; इसे 'दज्जल नस्ल' भी कहा जाता है। यह नदी किनारे उगने वाली घास और अनाज की भूसी पर पलती है, इसके बैल बेहद ताकतवर होते हैं और गायों में अपेक्षाकृत अच्छी दूध देने की क्षमता भी पाई जाती है।

आलमबाड़ी (अलंबाड़ी) गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

आलमबाड़ी (अलंबाड़ी)

स्थानतमिलनाडु

दूधसालाना लगभग 432 किलोग्राम

आलमबाड़ी नस्ल का मुँह लंबा और अपेक्षाकृत कम चौड़ा होता है, जबकि सींग लंबे होते हैं। यह मुख्यतः खेती-किसानी के भारवहन कार्यों में उपयोग होने वाली नस्ल है।

पुलिकुलम गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

पुलिकुलम

स्थानतमिलनाडु

दूधबहुत कम (मुख्यतः बछड़ों के लिए पर्याप्त)

पुलिकुलम एक फुर्तीली और सख्त भारवाहक नस्ल है, जो सूखे इलाकों में भी सहजता से पल जाती है। यह नस्ल तमिलनाडु के पारंपरिक जल्लीकट्टू खेल से भी जुड़ी हुई है और अपनी मजबूती के लिए जानी जाती है।

उम्बलाचेरी गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

उम्बलाचेरी

स्थानतमिलनाडु (तंजावुर, नागपट्टिनम)

दूधसालाना लगभग 494 किलोग्राम

उम्बलाचेरी नस्ल विशेष रूप से धान के दलदली खेतों में हल जोतने के लिए विकसित हुई है। छोटे कद और मजबूत पैरों के कारण यह कीचड़ भरे खेतों में आसानी से काम कर पाती है।

पोनवार गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

पोनवार

स्थानउत्तर प्रदेश (पीलीभीत, रुहेलखंड)

दूधसालाना लगभग 300-459 किलोग्राम

पोनवार नस्ल के सींग 12-18 इंच तक लंबे होते हैं और पूँछ भी लंबी होती है। शरीर का रंग प्रायः काला-सफेद होता है और यह नस्ल दूध कम देती है, लेकिन भार ढोने में उपयोगी मानी जाती है।

रेड कंधारी गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

रेड कंधारी

स्थानमराठवाड़ा, महाराष्ट्र (नांदेड़)

दूधसालाना लगभग 500-598 किलोग्राम

रेड कंधारी गहरे लाल रंग की एक मजबूत भारवाहक नस्ल है, जो मराठवाड़ा क्षेत्र की कठिन जलवायु में पलने के लिए अनुकूलित है। इसके बैल खेती के भारी कामों में उपयोगी माने जाते हैं।

पुंगनूर गाय की तस्वीर बौनी नस्ल (विश्व की सबसे छोटी नस्लों में एक)

पुंगनूर

स्थानआंध्र प्रदेश (चित्तूर)

दूधसालाना लगभग 194-1100 किलोग्राम

पुंगनूर को दुनिया की सबसे छोटे कद की देशी गाय नस्लों में गिना जाता है, जिसकी ऊँचाई मुश्किल से 70-90 सेंटीमीटर तक होती है। छोटे आकार के बावजूद इसका दूध पौष्टिकता में समृद्ध माना जाता है, इसलिए घर में पालने के लिए यह लोकप्रिय है। यह नस्ल विलुप्ति के खतरे में है और इसके संरक्षण के प्रयास जारी हैं।

मोटू गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

मोटू

स्थानओडिशा (कोरापुट), छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश

दूधसालाना लगभग 100-140 किलोग्राम

मोटू नस्ल पूर्वी भारत के आदिवासी बहुल इलाकों की एक कठोर एवं सहनशील नस्ल है। स्थानीय किसान इसे कम संसाधनों में खेती के छोटे-मोटे कामों के लिए पालते हैं।

मालनाड गिड्डा गाय की तस्वीर बौनी नस्ल, अत्यंत रोग-प्रतिरोधी

मालनाड गिड्डा

स्थानकर्नाटक (पश्चिमी घाट, मलनाड क्षेत्र)

दूधसालाना लगभग 220 किलोग्राम

मालनाड गिड्डा एक छोटे कद की, बेहद सख्त-जान नस्ल है जो पश्चिमी घाट की भारी बारिश और घने जंगलों में भी बिना किसी विशेष देखभाल के जीवित रह लेती है। इसके गोबर व मूत्र को जैविक खेती में विशेष उपयोगी माना जाता है।

खोसली गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

खोसली

स्थानछत्तीसगढ़

दूधसालाना लगभग 200-250 किलोग्राम

खोसली छत्तीसगढ़ की एक स्थानीय नस्ल है, जिसे किसान मुख्यतः खेती-किसानी के हल्के कामों और स्थानीय परिस्थितियों में पालन के लिए रखते हैं।

खरियार गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

खरियार

स्थानओडिशा

दूधसालाना लगभग 300-450 किलोग्राम

खरियार ओडिशा के स्थानीय इलाकों की एक कम प्रचलित लेकिन क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुकूल ढली हुई नस्ल है, जो पारंपरिक खेती में सहायक होती है।

घुमसरी (घुमुसरी) गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

घुमसरी (घुमुसरी)

स्थानओडिशा (कटक)

दूधसालाना लगभग 450-650 किलोग्राम

घुमसरी ओडिशा की एक स्थानीय भारवाहक नस्ल है, जो क्षेत्रीय किसानों के लिए खेती के परंपरागत कार्यों में सहायक रही है।

गंगातीरी गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल

गंगातीरी

स्थानबिहार और वाराणसी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश

दूधसालाना लगभग 900-1200 किलोग्राम

गंगा नदी के किनारे के उपजाऊ मैदानी इलाकों में पाए जाने के कारण इस नस्ल का नाम गंगातीरी पड़ा। यह अपेक्षाकृत अच्छी दुधारू नस्ल मानी जाती है और साथ ही खेती के कामों में भी उपयोगी है।

भींजरपुरी (बिंझारपुरी) गाय की तस्वीर दोहरे प्रयोजन की नस्ल

भींजरपुरी (बिंझारपुरी)

स्थानओडिशा (जाजपुर, कटक)

दूधसालाना लगभग 915-1350 किलोग्राम

बिंझारपुरी नस्ल ओडिशा की उन गिनी-चुनी नस्लों में है जो अच्छी मात्रा में दूध भी देती हैं और खेती के काम में भी उपयोगी मानी जाती हैं।

बेलाही गाय की तस्वीर भारवाहक नस्ल

बेलाही

स्थानहरियाणा, चंडीगढ़

दूधसालाना 182 से 2092 किलोग्राम तक (व्यापक विविधता)

बेलाही उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की एक स्थानीय नस्ल है, जिसे किसान पारंपरिक रूप से खेती के भारवहन कार्यों के लिए पालते आए हैं।